धरना प्रदर्शन क्या होता है और धरना और प्रदर्शन में क्या अंतर है



हमारा देश एक लोकतंत्र है और इस देश में अपनी बात रखने का सबको अधिकार है। लोकतंत्र की अन्य विशेषताओं में एक विरोध करने का अधिकार हमारे प्रजातंत्र की मजबूती और परिपक्वता की निशानी है। हम सरकार की किसी बात से सहमत या असहमत हो सकते हैं। सरकार से हम अपने हक़ और अपने न्याय के लिए आवाज भी उठा सकते हैं। हमारे देश में जनता के हक़ को सरकार तथा सम्बंधित संस्थाओं तक पंहुचाने के लिए अकसर धरना और प्रदर्शन का सहारा लिया जाता है। धरना और प्रदर्शन के द्वारा जनता अपनी असहमति भी सरकार तक पंहुचा सकती है। आज के इस पोस्ट में आईये हम देखते हैं धरना और प्रदर्शन किसे कहते हैं और दोनों में क्या अंतर है




धरना किसे कहते हैं




धरना हमारे देश में विरोध प्रदर्शित करने का एक शांतिपूर्ण तरीका है। यह एक तरह का अहिंसक विरोध है जिसमे धरना देने वाले कर्ज लेने वाले या अत्याचारी के दरवाजे पर शांति पूर्वक बैठकर अपनी असहमति प्रकट करते हैं। वर्तमान में इसका प्रयोग हमारे देश में प्रायः अन्याय, अत्याचार और गलत नीतियों के विरोध में सरकार या सम्बंधित व्यक्ति के सामने खूब होता है। धरना का प्रयोग आज़ादी आंदोलनों में भी होता था। महात्मा गाँधी सत्याग्रह तथा अपने कई आंदोलनों में इसका प्रयोग करते थे। 


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धरना शब्द संस्कृत के धरणम से उत्पन्न हुआ है। धरना वास्तव में किसी वस्तु या किसी बात पर अपना ध्यान स्थापित करने की क्रिया है। धरना अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए पूर्ण लगन और चेतना में किया गया एक प्रयास है। धरना में धीरज और प्रतीक्षा निहित है।


भारत में सरकार के खिलाफ धरना देने के लिए अनुमति का प्रावधान है। हमारे देश में कुछ स्थानों को धरना देने के लिए ही उपयोग किया जाता है। दिल्ली में इसी तरह का एक स्थान जंतर मंतर है जहाँ हमेशा किसी न किसी का धरना चलता ही रहता है।




प्रदर्शन क्या होता है




प्रदर्शन या डेमोंस्ट्रेशन लोगों के समूहों का सरकार या जिम्मेदार संस्थाओं की नीतियों या कार्यों के समर्थन या विरोध करने की एक क्रिया है। प्रदर्शन में कुछ लोगों से लेकर लाखों की भीड़ भी हो सकती है। प्रदर्शन प्रायः किसी सभा के बाद शुरू होती है या किसी सभा में समाप्त होती है।


प्रदर्शन अहिंसक या हिंसक भी हो सकते हैं। यह उस समय की तात्कालिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कई बार प्रदर्शन अहिंसक तौर पर शुरू होकर बाद में हिंसक हो जाता है और इसमें काफी सार्वजानिक सम्पत्तियों को नुकसान पंहुचाया जाता है। प्रदर्शन में लोग खड़े होकर नारे लगाकर या मार्च करके अपना विरोध दर्ज कराते हैं। प्रदर्शन में अकसर बैनर और तख्तियों का प्रयोग किया जाता है जिनपर उनके विरोध के नारे लिखे रहते हैं। 


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प्रदर्शन या डेमोंस्ट्रेशन टर्म का प्रयोग उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से इस्तेमाल किया जाता है। उस समय डैनियल ओ कनेल द्वारा आयरलैंड प्रेरित प्रदर्शनकारियों की जनसभाओं को मॉन्स्टर मीटिंग कहा जाता था।

प्रदर्शन जनसमस्याओं को भी दिखाने का एक तरीका होता है। कई बार अन्याय या सरकार की गलत नीतियों के विरुद्ध सरकार को चेताने और जनता को जगाने के लिए भी प्रदर्शन का सहारा लिया जाता है।



धरना और प्रदर्शन में क्या अंतर है 


धरना और प्रदर्शन दोनों का उद्द्येश्य एक होते हुए भी दोनों में कई फर्क हैं।

  • धरना एक व्यक्ति के द्वारा भी हो सकता है और हजारों लोगों का भी जबकि प्रदर्शन एक से ज्यादा लोगों के द्वारा होता है। प्रदर्शनकारियों की संख्या सैकड़ों हजारों में हो सकती है।
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  • धरना में बैठना अनिवार्य होता है जबकि प्रदर्शन खड़े होकर  या चलकर किया जाता है। 

  • धरना प्रायः शांतिपूर्वक बैठकर किया जाता है जबकि प्रदर्शन शांतिपूर्वक या नारे लगाकर दोनों तरह से किया जाता है।

  • धरना अहिंसक विरोध दर्ज कराने या अपनी मांग मनवाने का तरीका है जबकि प्रदर्शन कई बार हिंसक भी हो जाते हैं और कई बार सार्वजानिक सम्पत्तियों का नुकसान भी किया जाता है।
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  • धरना के लिए अकसर जगह निश्चित होती है जबकि प्रदर्शन प्रायः किसी भी रोड पर किया जा सकता है।

  • धरना में कोई सभा नहीं होती है जबकि प्रदर्शन प्रायः किसी सभा से शुरू होती है या अंत में सभा में तब्दील हो जाती है।


इस प्रकार आपने देखा कि धरना और प्रदर्शन प्रजातंत्र में जनता द्वारा अपने प्रति हुए अन्याय और असहमतियों को सरकार तक पंहुचाने का तरीका है। धरना और प्रदर्शन द्वारा जनता सरकार को जगा सकती है और उसे मनमानी करने से रोक सकती है। धरना और प्रदर्शन हालाँकि दोनों का मकसद एक ही है फिर भी दोनों के तरीके में काफी अंतर है।


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