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भजन और कीर्तन में क्या अंतर है



आस्तिक व्यक्ति के जीवन का एक उद्देश्य ईश्वर से साक्षात्कार भी होता है। वह सारे कामों को करते हुए भी ईश्वर को नहीं भूलता। वह अपने दिनचर्या का कुछ हिस्सा ईश्वर को याद करने में भी देता है। इसके द्वारा वह ईश्वर को उसकी कृपा के लिए जहाँ एक ओर धन्यवाद् देता है वहीँ दूसरी ओर अपने मंगल के लिए उनसे प्रार्थना भी करता है। इस प्रार्थना के लिए वह ईश्वर का स्मरण कई माध्यमों द्वारा करता है और इन्हीं माध्यमों में संगीत भी एक माध्यम है जिसके द्वारा वह ईश्वर में लीन होना चाहता है। भक्ति संगीत की दो परम्पराएं हमारे यहाँ प्रचलित हैं जिनमे भजन और कीर्तन खूब लोकप्रिय हैं। भजन और कीर्तन हालाँकि दोनों एक जैसे लगते हैं किन्तु दोनों में कई फर्क भी हैं। आइये देखते हैं भजन और कीर्तन क्या हैं और इनमे क्या अंतर हैं

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भजन क्या है 


भारतीय संगीत को मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत और तीसरा लोक संगीत। भजन मूल रूप से किसी देवता की प्रशंसा में गाया जाने वाला गीत है जो सुगम संगीत की एक शैली है। हालाँकि भजन शास्त्रीय और लोक संगीत की शैली में भी हो सकता है। इसे प्रायः मंच पर गाया जाता है किन्तु इसे मंदिरों में भी खूब गाया जाता है।

भजन संस्कृत के भजनम या भज से निकला हुआ शब्द है जिसका अर्थ होता है श्रद्धा। भजन का अर्थ बाँटना भी होता है। दूसरे अन्य अर्थों में यह समर्पण, जुड़ाव, वंदना करना भी होता है। भजन के माध्यम से भक्त अपने देवता से समर्पण महसूस करता है उसकी उपासना करता है वंदना करता है।

भजन में प्रायः एक घटना, कथा या विचार का वर्णन होता है। कई बार भजन में देवताओं के लिए प्रशंसा और उनकी महिमा के चर्चे होते हैं। इसे प्रायः एक गायक जाता है। कभी कभी इसे एक से अधिक गायक भी एकसाथ गाते हैं। भजन गायन में तबला,ढोलक, झांझ आदि का प्रयोग किया जाता है। इसे मंदिरों में, घर में, खुले में या किसी ऐतिहासिक महत्त्व के स्थान पर गाया जाता है।

भजन संगीत और कला की एक शैली है जो भक्ति आंदोलन के साथ साथ विक्सित हुआ है। इस शैली में निर्गुणी, गोरखनाथी, वल्लभपंती, अष्टछाप, मधुरभाक्ति और पारम्परिक दक्षिण भारतीय रूप सम्प्रदाय भजन के अपने तरीके हैं।


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कीर्तन क्या है 


कीर्तन एक संस्कृत शब्द है जो वैसे तो कई अर्थ में प्रयुक्त होता है किन्तु सबका भाव एक ही होता है किसी कथा का वर्णन करना, सुनाना, बताना या विचार का वर्णन करना। यह धार्मिक समारोहों में गाये जाने वाले गीतों की एक शैली है जिसमे धार्मिक विचारों का एक समूह के द्वारा गायन होता है।

वैदिक अनुकीर्तन परंपरा से निकले हुए इस शैली में गायकों का एक समूह किसी देवता के लिए या आध्यात्मिक विचारों का वर्णन करने के लिए प्रायः सामूहिक संगीत करते हैं। कई बार यह प्रश्न उत्तर के रूप में भी होता है तो कई बार साथी गायक उस गीत की पंक्तियों को दुहराते हैं। कीर्तन की कई परम्पराओं में नृत्य या नाट्य भी शामिल होती है। कीर्तन में प्रायः दर्शक भी गीतों को दुहराते हैं अर्थात कीर्तन गायन में शामिल होते हैं। 


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कीर्तन गायन करने वाले प्रायः टोली में होते हैं जिनको कीर्तनिया कहा जाता है। कीर्तन गायन में प्रायः कुछ वाद्ययंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है। इसमें सबसे प्रमुख करतल या झांझ मंजीरा होता है। इसके अलावा हारमोनियम,वीणा, एकतारा,तबला, मृदंग आदि भी वाद्ययंत्रों का प्रयोग प्रमुखता से होता है।
कीर्तन को प्रायः धार्मिक अवसरों पर गाया जाता है। उत्तर भारत में मंदिरों में प्रायः कीर्तन का आयोजन किया जाता है। 


भजन और कीर्तन में क्या अंतर है 

  • भजन प्रायः अकेले गाया जाता है जबकि कीर्तन सामूहिक रूप में गाया जाता है। कई बार इसमें दर्शक भी शामिल होते हैं।

  • भजन में नाट्य या अभिनय शामिल नहीं होता है जबकि कीर्तन के साथ नाट्य या अभिनय भी शामिल हो सकता है।

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  • भजन किसी देवता की उपासना में गाया जाने वाला सुगम संगीत होता है जबकि कीर्तन में किसी कथा, विचार या जीवन के दर्शन का वर्णन होता है।

  • भजन मंच से, मंदिरों में घरों में कंही भी गाया जा सकता है जबकि कीर्तन किसी मंदिर में या किसी धार्मिक समारोह में किसी अवसर पर गाया जाता है।

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  • भजन में करतल या झांझ का प्रयोग आवश्यक नहीं होता है किन्तु करतल कीर्तन का एक अभिन्न हिस्सा है।

  • भजन में प्रश्न उत्तर नहीं होता है जबकि कीर्तन में प्रायः प्रश्नोत्तर होता है या एक गायक के द्वारा गाये हुए पंक्तियों को अन्य गायक दुहराते हैं।
भजन और कीर्तन में अंतर होते हुए भी दोनों का उद्द्येश्य मानव को ईश्वर से जोड़ना है। दोनों गायन की शैलियां हैं और दोनों ही खूब लोकप्रिय हैं। भजन और कीर्तन मानव मन को शांत और ऊर्जा से भरते हैं। मन आस्था और धनात्मक ऊर्जा से लबालब होजाता है जो उन्हें आशावादी बनाता है।


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