Differences Between Police Custody And Judicial Custody

पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत में क्या अंतर है 


Difference Between Police Custody And Judicial Custody

पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत को अकसर लोग एक ही अर्थ में ले लेते हैं और सुनने में भी ये दोनों एक जैसे ही लगते हैं। किन्तु बारीकी से देखा जाए तो दोनों में अंतर है और ये दोनों दो बातें हैं। किसी अपराध के बाद आरोपी को पुलिस गिरफ्तार करती है जिसे अकसर पुलिस हिरासत या पुलिस कस्टडी कहा जाता है। पुलिस कस्टडी की तय अवधि के बाद न्यायलय द्वारा कई बार आरोपी को एक निश्चित अवधि के लिए जेल में रखा जाता है। इस प्रक्रिया को न्यायिक हिरासत या जुडिशियल कस्टडी कहा जाता है। वास्तव में हिरासत की एक प्रक्रिया गिरफ़्तारी होती है। किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अर्थ है उस व्यक्ति पर नज़र रखना और उसकी गतिविधियों पर आंशिक या पूरी तरह से पाबन्दी लगाना है ताकि वह अन्य आपराधिक क्रिया न कर सके, सबूतों से छेड़छाड़ न कर सके और न ही गवाहों को प्रभावित कर सके। 


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क्या होती है पुलिस कस्टडी 

What is Police Custody or Police Remand


किसी अपराध की सूचना मिलने के साथ ही पुलिस अपना कार्य शुरू कर देती है। अपराध की धारा और गंभीरता के आधार पर पुलिस उस अपराध में शामिल व्यक्ति के विरुद्ध अपनी कार्यवाही शुरू करती है। इस क्रम में पुलिस उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है ताकि उस व्यक्ति को आगे अन्य अपराध करने से रोका जा सके तथा आगे उसके विरुद्ध न्यायलय में मुक़दमा चलाया जा सके। पुलिस की इस तरह किसी संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार करके हवालात में रखने को पुलिस कस्टडी या पुलिस हिरासत कहा जाता है। पुलिस कस्टडी में रखे व्यक्ति को थाने में बने हवालात में रखा जाता है। पुलिस हिरासत या कस्टडी में संदिग्ध व्यक्ति को किसी भी हालत में 24 घंटे से ज्यादा नहीं रखा जा सकता है। सम्बंधित पुलिस अधिकारी को 24 घंटे के भीतर उस व्यक्ति को सम्बंधित न्यायलय के समक्ष पेश करना होता है। पुलिस संदिग्ध व्यक्ति को पुलिस कस्टडी में रखकर उससे पूछताछ भी कर सकती है। 

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पुलिस अपने थाना क्षेत्रों के अंदर हुए संज्ञेय अपराधों (जिनमे कम से कम तीन वर्ष की सजा का प्रावधान हो ) की प्रथिमिकी दर्ज होने के बाद आरोपी को अपनी हिरासत में ले लेती है ताकि वह आगे अन्य कोई अपराध न कर सके, सबूतों से छेड़छाड़ न कर सके और न ही गवाहों को प्रभावित कर सके। इस तरह की गिरफ़्तारी में पुलिस के पास अधिकार होता है कि वह आरोपी को अधिकतम 24 घंटे के लिए लॉकअप में रख सके। इस अवधि के दौरान पुलिस को आरोपी को किसी भी न्यायलय के समक्ष पेश करना होता है जहाँ आवश्यकतानुसार पुलिस आरोपी को पुलिस हिरासत की अवधि बढ़ाने की मांग कर सकती है ताकि उसे आरोपी से पूछताछ करने का समय मिल सके। न्यायलय पुलिस को CrPc की धारा 167 के तहत आरोपी को अधिकत्तम 15 दिन पुलिस हिरासत में रखने का आदेश दे सकती है।

कुछ राज्यों में जैसे महाराष्ट्र में कुछ विशेष प्रावधानों(महाराष्ट्र कण्ट्रोल ऑफ़ ऑर्गनाइज़ क्राइम एक्ट 199) के तहत पुलिस आरोपी को 30 दिनों तक अपने हिरासत में रख सकती है।

न्यायिक हिरासत क्या होती है

What is Judicial Custody


पुलिस कस्टडी की अवधि ख़त्म होने के बाद न्यायलय अपराधी को आवश्यकतानुसार हिरासत में रख सकती है। पुलिस आरोपी को गिरफ़्तारी के 24 घंटे के भीतर न्यायलय के समक्ष पेश करती है जहाँ न्यायधीश आवश्यकतानुसार उसे न्यायिक हिरासत में रखने का आदेश जारी कर सकता है। इसके लिए अपराधी को जेल में रखा जाता है। इस तरह की हिरासत को न्यायिक हिरासत या जुडिशियल कस्टडी कहा जाता है। न्यायिक हिरासत का उद्द्येश्य आरोपी को सबूतों से छेड़छाड़ से रोकना और गवाहों को धमकाने या प्रलोभन देने से रोकना होता है। इसके साथ ही न्यायलय कानून को 90 दिनों के भीतर आरोपपत्र दाखिल करने का आदेश जारी करता है। 90 दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल न होने की स्थिति में कुछ जघन्य अपराधों जैसे हत्या और बलात्कार को छोड़ कर अन्य मामलों में न्यायलय आरोपी को जमानत दे देती है। कम गंभीर अपराधों में न्यायिक हिरासत की अवधि 60 दिन की भी हो सकती है यदि न्यायलय को यकीन हो जाये कि कारण उचित और पर्याप्त है। 

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पुलिस कस्टडी के विपरीत जुडिशियल कस्टडी में अपराधी तबतक रहते हैं जबतक कि उनकी जमानत न हो जाये या फिर जबतक न्यायलय में उनपर मुकदमे का फैसला न आ जाये। न्यायिक हिरासत में आरोपी को जेल में न्यायलय की निगरानी में रखा जाता है। न्यायिक हिरासत में आरोपी से पुलिस कोई पूछताछ नहीं कर सकती। यदि पूछताछ बहुत आवश्यक हो तो पुलिस को इसके लिए न्यायलय से आदेश लेना पड़ता है। न्यायिक हिरासत में उन सभी मामलों में जिनमे पुलिस हिरासत होती है आरोपी को रखा जा सकता है इसके साथ ही कोर्ट की अवमानना और जमानत खारिज होने वाले मामलों में भी न्यायिक हिरासत हो सकती है।

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क्या होता है पुलिस कस्टडी और जुडिशियल कस्टडी में अंतर 

Difference Between Police Custody And Judicial Custody



  • पुलिस कस्टडी यानि पुलिस हिरासत सम्बंधित पुलिस के द्वारा होती है जबकि न्यायिक हिरासत सम्बंधित मजिस्ट्रेट के आदेश द्वारा पारित होता है।

  • पुलिस कस्टडी आरोपी को पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी के साथ शुरू होती है जबकि न्यायिक हिरासत तब शुरू होती है जब अदालत आरोपी को पुलिस हिरासत से जेल भेज देती है।
Royalty-Free photo: Gray jail hallway | PickPik

  • पुलिस कस्टडी में आरोपी को पुलिस थाने में बने लॉकअप में रखा जाता है जबकि न्यायिक हिरासत में आरोपी को जेल में रखा जाता है।

  • पुलिस हिरासत में रखे आरोपी को 24 घंटे के अंदर किसी न्यायलय में उपस्थित करना पड़ता है जबकि न्यायिक हिरासत में रखे व्यक्ति को अदालत में मामला चलने तक या फिर उसे जमानत मिलने तक रखा जा सकता है।

  • जमानत पर रिहा अपराधियों को पुलिस कस्टडी में नहीं भेजा जा सकता। एक बार चार्जशीट दाखिल करने के बाद पुलिस किसी आरोपी को अपने हिरासत में नहीं रख सकती। इन स्थितियों यदि न्यायलय को लगता है कि हिरासत आवश्यक है तो वह आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दे सकती है।

  • पुलिस कस्टडी में आरोपी को पुलिस यातना देकर पूछताछ कर सकती है किन्तु न्यायिक हिरासत में पुलिस आरोपी से पूछताछ नहीं कर सकती। यदि पूछताछ करना आवश्यक हो तो पुलिस को पहले न्यायायल से आज्ञा लेनी पड़ती है।

  • पुलिस कस्टडी पुलिस द्वारा प्रदत्त सुरक्षा के अंतर्गत होता है जबकि न्यायिक हिरासत में आरोपी की सुरक्षा न्यायलय के अंतर्गत होता है।
File:Bhajanpura.jpg - Wikipedia
  • पुलिस हिरासत किसी भी संज्ञेय अपराध के लिए जैसे हत्या,बलात्कार, लूट आदि के लिए की जाती है वहीँ न्यायिक हिरासत इन सब मामलों के अतिरिक्त कोर्ट की अवमानना, जमानत ख़ारिज होने वाले मामले आदि में भी होती है।

उपसंहार

पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत दोनों ही व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करती हैं। दोनों का उद्द्येश्य एक ही होता है आरोपी गवाहों को प्रभावित न कर सके, सबूतों से छेड़छाड़ न कर सके और न ही कोई अन्य अपराध कर सके। पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत दोनों ही कानूनी प्रक्रिया के आवश्यक अंग हैं जिसमे पुलिस हिरासत से होते हुए आरोपी न्यायायिक हिरासत में जाता है।

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