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कुम्हार और कहार जातियोँ में क्या अंतर है



कुम्हार और कहार जातियोँ में क्या अंतर है



भारतीय समाज की कई अन्य विशेषताओं में एक इसकी जातीय व्यवस्था है जहाँ हर कार्य के लिए एक जाति निर्धारित थी और इस प्रकार समाज के हर व्यक्ति के लिए उसका रोजगार तय होता था। हर जाति का अपना एक इतिहास और अपना एक कुलदेवता और अपना एक व्यवसाय या रोजगार होता था। चूँकि जाति का आधार वंशगुनत होता था अतः उनके रोजगार भी एक तरह से वंशगुनत हो गए थे। पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही काम करने से इन जातियों के लोगों के कामों में पीढ़ी दर पीढ़ी के अनुभव का असर होता गया और यही वजह है ये अपने काम में परफेक्ट और माहिर होते गए। आज के इस पोस्ट में हम भारतीय समाज की दो प्राचीन और महत्वपूर्ण जातियां कुम्हार और कहार के बारे में जानेंगे और साथ ही यह भी जानेंगे कि दोनों में अंतर क्या है ?

कुम्हार कौन होते हैं


इंसानी सभ्यता की बात करें तो सबसे प्राचीन कलाओं में से एक मिटटी के बर्तन और खिलौने बनाने की कला है। भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में हम कह सकते हैं कि कुम्भकार या कुम्हार जाति भारत की सबसे प्राचीन जातियों में से एक है। कुम्हार भारतीय समाज की जाति व्यवस्था में मिटटी के बर्तन, मकानों के लिए खपड़े और मूर्ति बनाने वाले कारीगर वर्ग का जातीय नाम है। मिटटी के बर्तन बनाना कुम्हार जाति का पेशा और व्यवसाय है जिसे वे पीढ़ियों से करते आये हैं। कुम्हार जाति को प्रजापति के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, बिहार से लेकर महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश आदि में इस जाति का विस्तार पाया जाता है।



कुम्हार शब्द की उत्त्पत्ति


कुम्हार संस्कृत के शब्द कुम्भ कार से निकला हुआ प्रतीत होता है जिसका अर्थ कुम्भ यानि घड़ा बनाने वाला होता है। इन्हें कुम्भार, प्रजापति, प्रजापत, घूमियार, घूमर, कुमावत, भांडे, कुलाल या कलाल आदि नामों से भी अलग अलग प्रदेशों में जाना जाता है। कुम्हार हिन्दू और मुस्लमान दोनों धर्मों में होते हैं। हिन्दू कुम्हार में इनके दो वर्ग हैं शुद्ध कुम्हार और अशुद्ध कुम्हार। हिन्दुओं में कुम्हार को शूद्र वर्ग में रखा गया है। सरकारी वर्गीकरण में इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप में रखा गया है।
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कुम्हार कैसे उत्त्पन्न हुए


कुम्हार अपने को ब्रह्मा के पुत्र भगवान प्रजापति दक्ष के वंशज मानते हैं। इनका विश्वास है भगवान् प्रजापति ने ही इस ब्रह्माण्ड की रचना की है। इनकी आराध्य देवी या कुलदेवी श्री यादे माँ हैं। कुम्हारों में एक दंत कथा बहुत ही प्रचलित है। एक बार ब्रह्मा जी ने अपने सभी पुत्रों को गन्ने दिए। उनके सभी पुत्र अपने अपने गन्ने खा लिए किन्तु कार्य की अधिकता होने के कारण कुम्हार ने अपना गन्ना मिटटी में रख दिया। मिटटी के संपर्क में आने के कारण गन्ना पौधे के रूप में विकसित हो गया। कुछ समय के बाद ब्रह्मा जी ने पुत्रों से गन्ने मांगे। कोई पुत्र अपना गन्ना लौटा न सका पर कुम्हार ने ब्रह्मा जी को गन्ने का पौधा दे दिया। यह देख ब्रह्मा जी कुम्हार से अति प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे प्रजापति नाम से उद्घोषित किया।




कुम्हार जाति के अन्य समूह


कुम्हारों के कई समूह पाए जाते हैं। इनका एक वर्ग अपने को प्रजापति कहता है। क्षेत्र विशेष की भाषा,संस्कृति और कार्य की वजह से इन्हें कई नामों और समूहों के रूप में जाना जाता है। इन समूहों में गुजरती कुम्हार, राणा कुम्हार, लाद, तेलंगी कुमावत आदि प्रमुख हैं। हथरेटी, चकरेटी, गोला, कन्नौजिया, पंडित, तुकराना, गधेरे, पाल, भकत, बेरा, प्रधान, चौधरी आदि प्रमुख हैं।

कुम्हार जाति का मुख्य पेशा


कुम्हारों का मुख्य पेशा मिटटी के बर्तन, दिए, खपड़ा आदि बनाना है। इसके अतिरिक्त कई कुम्हार मिटटी की मूर्तियां और खिलौने बनाते हैं। इसके साथ ही कुम्हार कृषि कार्य भी करते हैं। वर्तमान में शिक्षा के प्रसार की वजह से कुम्हार जाति के लोग कई अन्य क्षेत्रों में भी अपना योगदान दे रहे हैं। वे व्यवसाय के साथ साथ डॉक्टर, इंजीनियर तथा कई अन्य उच्च पदों पर अपनी योग्यता साबित कर रहें हैं।




कहार


कहार भारतीय सामाजिक संरचना में प्राचीन काल से ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। औद्योगिक क्रांति और विकास के इस दौर ने भले ही इनसे इनका रोजगार छीन लिया हो परन्तु एक समय था जब इनके बिना शादियां अधूरी मानी जाती थीं। जी हाँ कहार जाति भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही डोली उठाने और पानी भरने की जिम्मेदारी निभाती आ रही है। डोली उठाना इनका मुख्य पेशा रहा है।




कहार शब्द की उत्पत्ति


कहार शब्द की उतपत्ति के बारे में मान्यता है कि यह दो शब्द कन्धा और भार से मिलकर बना है। चूँकि इस जाति का मुख्य पेशा डोली उठाना और पानी भरना था जिसमे कंधे से भार उठाने की क्रिया करनी पड़ती थी, अतः इस तरह के कार्य करने वालों को कन्धा भार कहा जाने लगा जो बाद में कहार हो गया। एक और मान्यता के अनुसार कहार कन्धा और आहार शब्द से उत्पन्न हुआ है। ऐसा मानने की वजह कंधे से आहार यानि रोजी रोटी कमाने की वजह हो सकती है। भारत में कहार जाति का विस्तार बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश में है। उत्तर प्रदेश के पश्चिम जिलों में इनकी संख्या काफी है। इसके अतिरिक्त कहार कुछ बंगाल, राजस्थान और अन्य क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं।

कहार जाति की उत्पत्ति की कहानी


कहारों की उत्पत्ति के विषय में अनेक मत हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार इनकी उत्पत्ति उन सप्त ऋषियों से हुई है जिन्होंने चंद्रवंशी क्षत्रिय राजा नहुष की डोली उठाई थी। कुछ विद्वानों का मत है कि कहारों की उत्पत्ति कश्यप ऋषि से हुई है जो ब्रह्मा के दस पुत्रों से एक हैं। बिहार, बंगाल और त्रिपुरा में कहार अपने को मगध के राजा जरासंध का वंशज मानते हैं। एक अन्य मत के अनुसार कहार ब्राह्मण पिता और निषाद या चांडाल माता की मिश्रित संतान हैं। कहारों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो भी मत हो इतना तो तय है यह जाति अत्यंत प्राचीन है और आर्यों के आगमन के पूर्व इनका वर्चस्व गंगा के मैदानी इलाकों में काफी पुराना रहा था।




कहारों के अन्य नाम


कहार कई नामों से जाने जाते हैं। कई जगह उन्हें निषाद कहार, भोई कहार आदि नामों से जाना जाता है। राजस्थान में इनके तीन समूह हैं बुड़ाना, तुरहा और महारा।इन समूहों में कई कुल जैसे पिंडवाल, बामनावत, कटारिया, बिलावत, कश्यप और ओटासनिया शामिल हैं । उत्तर प्रदेश में इनके चार उप समूह हैं खरवार, बाथम, रवानी और जैसवार। इसके अतिरिक्त कश्यप और मद्गोला भी अन्य कुल हैं।

कहार जाति की कुलदेवी


कहारों की कुल देवी अंबा माता हैं इसके साथ ही इस समाज के लोग जय जल देव की भी अर्चना करते हैं। बिहार आदि क्षेत्रों में कहार विष्णुपद, मंगलगौरी तथा कलेसरी और धकमी माई की पूजा करते हैं वहीँ उत्तरप्रदेश के कहार मनसा देवी की पूजा करते हैं। दिल्ली और इसके आसपास के कहारों में संत कालू बाबा का भी जन्मदिन हर साल मनाया जाता है।

कहार जाति का मुख्य पेशा


कहार जाति का मुख्य रोजगार डोली उठाना और पानी भरना रहा है किन्तु सामाजिक परिवर्तन और औद्योगिक विकास की वजह से डोली प्रथा विलुप्त हो गयी। अतः बहुत सारे कहार कृषिकार्य में लग गए तथा कई अन्य रोजगार और व्यवसाय को अपना लिए। शिक्षा के प्रभाव की वजह से इनका सामाजिक स्तर ऊपर उठा है। आज सामान्य नौकरियों से लेकर अधिकारीयों तक में इस जाति की उपस्थिति होने लगी है।

कुम्हार और कहार जातियोँ में क्या अंतर है


  • कुम्हार जाति का मुख्य पेशा मिटटी के बर्तन, खिलौने, खपड़े, दिये आदि बनाना है जबकि कहार जाति डोली उठाने का कार्य करती थी।

  • कुम्हार की उत्पत्ति प्रजापति दक्ष से मानी जाती है वहीँ कहार की उत्पत्ति कश्यप ऋषि से मुख्यतः मानी जाती है।

  • कुम्हार कारीगर, कलाकार उद्यमी और व्यवसायी जाति मानी जाती है वहीँ कहार जाति सेवा प्रदाता और श्रमजीवी जाति मानी जाती है।

  • कुम्हार संस्कृत के कुम्भकार शब्द का अपभ्रंश माना जाता है जबकि कहार की उत्त्पत्ति के सम्बन्ध में माना जाता है कि यह कन्धा और भार या आहार से बना शब्द है।

  • कुम्हार जाति की कुलदेवी श्री यादे माँ हैं वहीँ कहार अम्बा देवी और जय जलदेव की उपासना करते हैं।

  • कुम्हार जाति की मुख्य पहचान चाक से होती है जबकि कहार जाति डोली से अपनी पहचान रखते हैं।

उपसंहार

कुम्हार और कहार दोनों ही जातियों की भारतीय समाज में अति प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दोनों ही जातियों ने अपने श्रम और अपनी कला से समाज में अपनी पहचान बनायी है और समाज की सेवा की है। कुम्हार अपने चाक और मिटटी की सहायता से जहाँ अपनी जीविका चलाते हैं वहीँ एक समय कहार डोली को अपने जीवन का मुख्य रोजगार मानते थे।

Ref :

https://en.wikipedia.org/wiki/Kumhar

http://prajapatiall.blogspot.com/2010/04/kumhar-and-prajapati-in-hinduism.html

https://joshuaproject.net/people_groups/17316/IN
https://peoplegroupsindia.com/profiles/kumhar/

https://peoplegroupsindia.com/profiles/kahar/

https://en.wikipedia.org/wiki/Kahar

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1 टिप्पणियाँ

  1. 100% गलत है, कुम्हार शूद्र नहीं है नमूने,
    सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि कुम्हार के द्वारा बनाये गये बर्तन समस्त हिन्दू समाज के लोग उपयोग मे लेते है घर मंदिर सब जगह पर। अगर शूद्र होते तो उनके बनाये कलश, मटका , इत्यादि समान मंदिर ,घर में कोन प्रयोग करते
    और कुम्हार पर मंदिर में पूजा करने पर वह मंदिर में प्रवेश पर कोई पाबंदी नहीं है ना ही पुराने समय में और ना ही आज के समय मे (जबकि शूद्रों के साथ भेदभाव होताहै और मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी लगा रखी थी और छुआछूत जैसे तमाम प्रतिबंध थे जोह गलत है)
    अगर कुम्हार शूद्र होते तो समस्त भारत में आरक्षण मे ओबीसी केटेगरी मे ना रखकर sc st केटेगरी मे रखते, (तुमारी जानकरी के लिए बता देता हू की आरक्षण उंच नीच भेदभाव शूद्र वेश्य क्षत्रिय व्यवस्था के आधार पर ही sc,st,obc केटेगरी बनाई गई है जिनको आरक्षण प्राप्त नहीं है उनको जनरल या सवर्ण कहते है)
    किसे जाती धर्म संप्रदाय के बारे मे गलत व्याख्या ना करे

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